स्कूल के बगल देसी दारू ठेका धरा की सड़क पर बचपन खतरे में, जिम्मेदार अब भी मौन जहां गुजरती हैं महिलाएं और बच्चे वहीं पाउच के ढेर और बदबू का जाल—क्या यही है व्यवस्था का चेहरा?
बारा प्रयागराज यमुनानगर क्षेत्र के बारा तहसील अंतर्गत ग्राम पंचायत धरा की यह मुख्य सड़क अब सिर्फ गंदगी और लापरवाही की कहानी नहीं, बल्कि बचपन और समाज पर पड़ते सीधे खतरे की जीवंत तस्वीर बन चुकी है। इस सड़क से हर दिन सैकड़ों महिलाएं सफर करती हैं, स्कूल जाने वाले बच्चे आते-जाते हैं, लेकिन जिस रास्ते से उन्हें सुरक्षित गुजरना चाहिए, वही रास्ता आज ‘देसी दारू ठेका’ के साये में बदहाल और भयावह बना हुआ है। सबसे चौंकाने वाली बात—बगल में सरकारी विद्यालय स्थिति को और गंभीर बनाता है यह तथ्य कि ठीक इसी रास्ते के पास एक सरकारी विद्यालय भी स्थित है। अब सवाल यह उठता है कि जब छोटे-छोटे बच्चे रोज इस रास्ते से गुजरते हैं, और सामने खुलेआम शराब के पाउच,गंदगी और नशे का माहौल देखते हैं, तो उनके मासूम मन पर क्या असर पड़ रहा होगा? क्या यही वातावरण उनके भविष्य की नींव बनेगा? क्या यही दृश्य उनके संस्कारों का हिस्सा बनेगा? यह सिर्फ गंदगी नहीं, पीढ़ियों पर असर डालने वाली लापरवाही है। महिलाओं की सुरक्षा भी सवालों में शाम के वक्त जब महिलाएं घर लौटती हैं, तो इस रास्ते का माहौल उन्हें असहज और भयभीत करता है। सड़क किनारे फैली गंदगी, बदबू और नशे में डूबे लोगों की मौजूदगी—यह सब मिलकर एक ऐसा माहौल बना देते हैं, जहां से गुजरना मजबूरी तो है, लेकिन सुरक्षित बिल्कुल नहीं। पाउच के ढेर, बदबू का जहर और हादसों की आहट हजारों की संख्या में बिखरे देसी दारू के पाउच और प्लास्टिक गिलास अब सिर्फ कचरा नहीं, बल्कि सड़क पर मौत का बिछा हुआ जाल बन चुके हैं। वाहन चालकों को फिसलन, दुर्गंध और अचानक सामने आ जाने वाले नशे में लोगों का खतरा हर पल बना रहता है। अब सवाल सीधे तौर पर आबकारी विभाग, प्रयागराज, जिला प्रशासन और तहसील प्रशासन, बारा से है—क्या इस ‘देसी दारू ठेका’ को स्कूल और मुख्य सड़क के इतने करीब चलाने की अनुमति दी गई है? अगर दी गई है, तो क्या बच्चों और महिलाओं की सुरक्षा को नजरअंदाज करना भी उस अनुमति का हिस्सा है? और अगर नहीं,तो यह खुला उल्लंघन आखिर किसके संरक्षण में चल रहा है? आज चुप्पी, कल पछतावा ग्रामीणों की आवाज अब चेतावनी बन चुकी है

अगर आज भी जिम्मेदार नहीं जागे, तो कल जब कोई अनहोनी होगी, जब कोई बच्चा या राहगीर इस लापरवाही का शिकार होगा, तब फिर वही शब्द गूंजेंगे—“जांच चल रही है” और उसी एक वाक्य में दफन हो जाएगी जिम्मेदारी, इंसाफ और संवेदनशीलता। धरा गांव का सीधा सवाल—क्या बच्चों का भविष्य इतना सस्ता है?यह खबर सिर्फ एक ठेके की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की संवेदनहीनता का आईना है। अब फैसला प्रशासन को करना है—सड़क को सुरक्षित बनाएंगे या ‘देसी दारू ठेका’ के साये में समाज को यूं ही सड़ने देंगे?

