धर्म की रक्षा के लिए खालसा का सृजन विश्व की सबसे बड़ी सामाजिक क्रांतियो में से एक है। वैसाखी के उस अविस्मरणीय दिन को शब्दो मे…..
प्रयागराज/सुविख्यात समाजसेवी व भारतीय जनता पार्टी अल्पसंख्यक मोर्चा काशी क्षेत्र, क्षेत्रीय उपाध्यक्ष सरदार पतविन्दर सिंह ने कहा कि वर्ष 1699 आनंदपुर पंजाब मे साहिब श्री गुरु गोविंद सिंह जी ने देशभर के श्रद्धालुओं को वैसाखी पर्व पर आनन्दपुर में जुटने का आह्वान किया।देशभर से करीब 80 हजार लोग वैसाखी का पर्व मनाने के लिए जूटे।
गुरुजी एक बंद तंबू में ध्यान मग्न थे उपस्थित श्रद्धालु उनकी प्रतीक्षा में बैठे थे कुछ देर बाद जब तंबू से निकलकर संगत के सामने उपस्थित हुए तो उनकी मुख मुद्रा धीर-गंभीर थी।उन्होंने अप्रत्याशित रूप से अपनी तलवार म्यान से निकली और उच्च स्वर में पुकार लगाई क्या कोई ऐसा श्रद्धालु है जो अपना सिर गुरु को अर्पण कर सके उनकी घोषणा से संगत में सन्नाटा छा गया गुरु जी ने तीन बार आवाज लगाई अंततः लाहौर का शिष्य दयाराम उठा गुरु जी बिना कोई प्रतिक्रिया जताए उसका हाथ पकड़े हुए तंबू के अंदर चले गए,कुछ देर बाद ताजा खून टपकती हुई तलवार लिए हुए आए और उसी तरह फिर पुकार लगाने और कुछ देर के सन्नाटे के बाद एक-एक कर चार अन्य शिष्य उठे,गुरु जी एक-एक को साथ लेकर तंबू के अंदर जाते और रक्तरंजित तलवार लिए बाहर आकर फिर कुर्बानी के लिए सिर की मांग करते आगे बढ़ने का क्रम चला।
तलवार में लगा खून बकरे का था जबकि संगत में बैठे लोग समझ रहे थे कि गुरु जी ने तंबू के अंदर एक-एक कर पांचो की बलि दे दी। इस अप्रत्याशित घटना क्रम के बाद गुरु जी ने उन लोगों को लेकर बाहर आए तो सभी पांचो पूरी तरह बदले हुए थे जिन्होंने मनुष्य के सबसे बड़े शत्रु,मृत्यु के भय को जीत लिया था।
पवित्र वाणियो के पाठ करते हुए गुरु जी ने “खंडे दा पाहुल” तैयार करने के लिए लोहे के एक कड़ाह में सतलुज का साफ जल डाला,बतासे डालें गए कृपाण से मिलकर अमृत तैयार हुआ।
गुरु जी ने पांचो प्यारो पर उसे छिड़का और सभी ने एक कटोरे से अमृत पान किया यह अमृत संचार पांचो का एक नए परिवार में जन्म था।
गुरु जी ने चार वर्णों को एक में मिलाकर खालसा की स्थापना की। गुरु जी ने अमृत छके पांचो प्यारो को “सिंह” कहकर अभिवादन किया और उन्हें खालसा की संज्ञा दी जिसका अर्थ है शुद्ध, खास और स्वतंत्र।
गुरु जी ने फिर एक और अप्रत्याशित कदम उठाते हुए ‘आपै गुरु -चेला’ की भावना से पांचो प्यारो से हाथ जोड़कर उसी तरीके से उन्हें भी अमृत संचार कराने का अनुरोध किया ।
विश्व इतिहास में किसी आध्यात्मिक गुरु का यह अभिनव प्रयोग और रूपांतरण था,जिसमें गुरु स्वयं अपने शिष्यों का शिष्य भी बना, गुरु गोविंद सिंह खालसा के संत सैनिक के भ्रातृत्व में समाहित हो गए।बैसाखी ‘सरबत दा भला’ (सर्वे भवन्तु सुखिनः) की कामना का दिन है। प्रत्येक भारतवासी को धर्म- संस्कृति रक्षक बनने के लिए संकल्पित किया तथा देश-समाज की एकता के पंच प्यारों (लाहौर के भाई दयाराम, दिल्ली के भाई धरमदास, द्वारका गुजरात के भाई मोहकमचंद, जगन्नाथपुरी उडीसा के भाई हिम्मतराय और, बिदर कर्नाटक के भाई साहबचंद) पंच प्यारे हुए ।
