भाजपा ने बंगाल में सत्ता हासिल करने के लिए जो किया है वह देश की आँखें खोलने के लिए बहुत है लेकिन विपक्ष अभी भी दिवास्वप्न देखने में मग्न है

बंगाल में बीजेपी के अभियान को समझना कोई रॉकेट साइंस नहीं है। पहले SIR के तहत 90.83 लाख वोटर हटाए गए। इसमें मुख्यतः मुसलमान थे जिन्हें आयोग ने घुसपैठिया माना और उन्हें सुनवाई का पर्याप्त मौका भी नहीं दिया। इसके बाद लगभग 31 लाख नए मतदाता जोड़े गए। पहले बंगाल में मतदाताओं की कुल संख्या 7.66 करोड़ थी जोकि SIR के बाद घट कर 6.77 करोड़ रह गई

अब जरा भाजपा और चुनाव आयोग के खेल को डिकोड किया जाए। 2021 के चुनाव में बंगाल में 82.30% (लगभग 6 करोड़ ) मतदाताओं ने वोट किया था। इसमें तृणमूल को लगभग 48.02% (लगभग 2.9 करोड़ वोट मिले थे जबकि भाजपा को 37.97% (लाभाग 2.29 करोड़ वोट मिले थे। यानी कि हार जीत में 10% मतों (लाभग 60 लाख वोट का अंतर था।
इसी अंतर को पाटने के लिए आयोग ने पहले 90 लाख वोटर के नाम मतदाता सूची से हटा दिए फिर भाजपा की जीत का मार्जिन बढ़ाने के लिए 31 लाख नए मतदाता जोड़े गए

इस बार 2026 में हुई पोलिंग पर नजर डालिए। अब तक आ रही खबरों के मुताबिक बंगाल में इस बार वोटिंग का आंकड़ा 92% से अधिक रहने वाला है। यही कि पिछले विधानसभा चुनावों के मुकाबले लगभग 12 प्रतिशत अधिक मतदान होगा।
तो पूरा गणित कुछ इस तरह का रहने वाला है।
तृणमूल को मिलेने वाला वोट 29000000 – 9000000 = 20000000
भाजपा को मिलने वाला वोट 22900000 + 3100000 = 26000000
यानी तृणमूल को इस बार भाजपा से 20% कम वोट मिलेगा। इसे अगर सीटों में बदला जाए तो भाजपा को 200 के ऊपर सीट मिलने जा रही है जबकि तृणमूल 110 के आसपास सिमट जाएगी। 2021 के चुनावों का ठीक उल्टा!!!
इस हेराफेरी को जायज़ ठहराने के लिए बताया जाएगा कि हिंदू और महिला वोटरों ने ममता दीदी से नाराज होकर भाजपा के पक्ष में बंपर वोटिंग की। इसी बंपर वोटिंग की वजह से मतदान प्रतिशत भी 82 से बढ़ कर 92 प्रतिशत हो गया है। बंगाल में ममता की हार लोकतंत्र के खत्म होने की आधिकारिक घोषणा होगी। लेकिन विपक्ष है कि चेतने को ही तैयार नहीं है। देश में बिना स्वतंत्र चुनाव आयोग के लोकतंत्र की कल्पना ही बेमानी है। भाजपा ने चुनाव आयोग को अपनी कठपुतली बना कर लोकतंत्र को बंधक बना लिया है। अब देखना यह है कि देश इस छद्म तानाशाही से कब मुक्ति पाता है। जय हिन्द।

