घूरपुर कांड चालान से शुरू हुआ विवाद बना संगीन पत्रकार की पिटाई मोबाइल तोड़ने और छीनकर भागने की

सवालों के घेरे में पुलिस कार्रवाई सात दिन की रिमांड, मेडिकल टूटा मोबाइल और गायब सीसीटीवी आखिर किसे बचाया जा रहा है?

घूरपुर, प्रयागराज। यमुनानगर क्षेत्र के घूरपुर थाना में रविवार को हुई घटना अब एक गंभीर और बहुस्तरीय विवाद का रूप ले चुकी है। वाहन चेकिंग के दौरान शुरू हुआ यह मामला अब पत्रकार उत्पीड़न, पुलिस कार्रवाई, विरोधाभासी बयानों और सबूतों की पारदर्शिता पर बड़े सवाल खड़े कर रहा है। रविवार को घूरपुर थाना क्षेत्र में नियमित वाहन चेकिंग चल रही थी। इसी दौरान अजय कुमार मिश्रा (पुत्र अरुण कुमार मिश्रा, निवासी ग्राम सारंगपुर, थाना घूरपुर) मौके पर पहुंचे। पुलिस के अनुसार उनकी बाइक का चालान किया गया, चालान से नाराज होकर उन्होंने सरकारी कार्य में बाधा डाली, दरोगा को धमकी दी कि परिणाम बुरा होगा और एक सिपाही का मोबाइल छीनकर भागने का प्रयास किया। पुलिस का दावा है कि आम जनता की मदद से उन्हें पकड़ा गया, थाने लाया गया और शांति भंग व सरकारी कार्य में बाधा के आरोप में कार्रवाई करते हुए उन्हें सात दिन की रिमांड पर जेल भेज दिया गया। वहीं दूसरी ओर मौके पर मौजूद चश्मदीदों और स्थानीय पत्रकारों के मुताबिक अजय कुमार मिश्रा मौके पर वीडियो बना रहे थे, तभी पुलिसकर्मियों ने उनका मोबाइल तोड़ दिया और उन्हें जबरन थाने ले जाकर मारपीट की गई। यहीं से मामला पूरी तरह उलझ जाता है। पूरे घटनाक्रम में मोबाइल फोन सबसे अहम कड़ी बन गया है—एक पक्ष कहता है कि पत्रकार का मोबाइल तोड़ा गया, जबकि दूसरा पक्ष कहता है कि पत्रकार ने पुलिस का मोबाइल छीना। ऐसे में सवाल खड़े होते हैं कि अगर पत्रकार का मोबाइल पहले ही तोड़ दिया गया, तो वह पुलिस का मोबाइल कैसे छीनकर भाग सकता था, और अगर उसने मोबाइल छीना तो उसका कोई स्पष्ट वीडियो या गवाह सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया। घटनास्थल पर चेकिंग के दौरान निगरानी की व्यवस्था होने की संभावना रहती है, ऐसे में सबसे बड़ा सवाल सीसीटीवी फुटेज को लेकर उठ रहा है कि क्या वहां कैमरे लगे थे, अगर लगे थे तो फुटेज कहां है और क्या उसे सुरक्षित रखा गया। सीसीटीवी ही इस पूरे विवाद का सबसे निष्पक्ष गवाह बन सकता है, लेकिन अब तक इसे सार्वजनिक नहीं किया गया है। जब अन्य पत्रकार थाने पहुंचे तो पुलिस द्वारा अजय कुमार मिश्रा को फर्जी पत्रकार बताया गया, जिससे एक नई बहस खड़ी हो गई है कि क्या उनके पहचान पत्र की मौके पर जांच हुई, अगर वे फर्जी हैं तो संबंधित संस्था पर कार्रवाई क्यों नहीं और अगर असली हैं तो फिर यह व्यवहार क्यों किया गया। दोनों पक्षों का मेडिकल कराया गया है, पुलिसकर्मियों का भी और पत्रकार का भी, लेकिन यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि मेडिकल रिपोर्ट निष्पक्ष जांच के साथ जोड़ी जाती है या सिर्फ औपचारिकता बनकर रह जाती है। यह मामला अब सिर्फ एक व्यक्ति तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि यह पत्रकारों के अधिकार, पुलिस की पारदर्शिता और कानून के निष्पक्ष अनुपालन पर बड़ा सवाल बन गया है। अगर कोई पत्रकार मौके पर वीडियो बनाता है तो क्या उसे रोका जा सकता है, क्या उसे डराया या हिरासत में लिया जा सकता है और क्या सच्चाई कैमरे में कैद होने से रोकी जा रही है। घूरपुर की यह घटना अब कई परतों में उलझ चुकी है—टूटा हुआ मोबाइल, छीनने का आरोप, सात दिन की रिमांड, मेडिकल रिपोर्ट और गायब सीसीटीवी—इन सबके बीच सच कहीं दबा हुआ नजर आ रहा है। जब तक हर सबूत, खासकर सीसीटीवी फुटेज, सामने नहीं आता तब तक यह मामला सवालों के घेरे में ही रहेगा और अब नजर इस बात पर टिकी है कि जांच निष्पक्ष होगी या नहीं और सच सामने आएगा या फाइलों में दबकर रह जाएगा।

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